सूरज को ढलना था

सूरज को ढलना था

सूरज को ढलना था सो ढल गया
आज फिर एक मौसम बदल गया
पंछियोंका बसेरा भी क्या बसेरा
पंछी ऊब गया सो निकल गया

ख़्वाब ख़त्म हो जाए तो पूरा हो
क्यों किसीका फ़साना अधूरा हो
क्या दिन क्या रातका अंधेरा
अपना वक़्त हुवा सो निकल गया

मैं मुसाफ़िर मेरा क्या ठिकाना
जहाँ राह मुड़े वहाँ चलते जाना
हर मोड़पे पलभरका रुकना मेरा
मंज़िलने पुकारा सो निकल गया

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